मातङ्ग–शक्रसंवादः
Mataṅga–Śakra Dialogue on Tapas, Status, and Moral Qualities
यो वत्स्यति द्रक्ष्यति वापि मर्त्य- स्तस्मै प्रयच्छन्ति सुखानि देवा: । तद्धभाविता: स्पर्शनदर्शनेन इष्टां गतिं तस्य सुरा दिशन्ति
yo vatsyati drakṣyati vāpi martyaḥ tasmai prayacchanti sukhāni devāḥ | taddhāva-bhāvitāḥ sparśana-darśanena iṣṭāṃ gatiṃ tasya surā diśanti ||
जो मनुष्य गंगाजी के तट पर निवास करता है या उनका दर्शन मात्र करता है, उसे देवता सुख प्रदान करते हैं। और जो उनके स्पर्श तथा दर्शन से पवित्र होकर भावित हो गए हैं, उन्हें गंगाजी से ही महत्त्व प्राप्त देवगण मनोवांछित शुभ गति प्रदान करते हैं।
सिद्ध उवाच