Rudra-Śiva: Names, Two Natures, and the Logic of Epithets (रुद्रनाम-बहुरूपत्व-प्रकरणम्)
वृक्षमूलपरो नित्यं शून्यागारनिवेशन: । नदीपुलिनशायी च नदीतीररतिश्व यः
संन्यासी द्विज के लिए उचित है कि वह नित्य वृक्ष के मूल में, सूने गृह में अथवा नदी के पुलिन पर शयन करे, और नदी-तट में ही रमण करे। इस प्रकार वह बाह्य आसक्तियों से दूर रहकर अपने अन्तःकरण में परमात्मा का ध्यान करे।
श्रीमहेश्वर उवाच