आदि पर्व, अध्याय ३८ — शमीक-उपदेशः, शाप-संदेशः, तक्षक-प्रसङ्गः (Śamīka’s counsel, the curse-message, and Takṣaka’s approach)
तस्य पुत्रो जरत्कारोर्भविष्यति तपोधन: । आस्तीको नाम यज्ञं स प्रतिषेत्स्यति तं तदा । तत्र मोक्ष्यन्ति भुजगा ये भविष्यन्ति धार्मिका:,उन्हींके आस्तीक नामका एक महातपस्वी पुत्र उत्पन्न होगा जो उस यज्ञको बंद करा देगा। अतः जो सर्प धार्मिक होंगे, वे उसमें जलनेसे बच जायँगे
उस जरत्कारु का आस्तीक नामक एक तपोधन पुत्र उत्पन्न होगा; वह उस समय उस यज्ञ को रोक देगा। जो सर्प धर्मात्मा होंगे, वे वहाँ (यज्ञाग्नि में) जलने से मुक्त हो जाएंगे।
शेष उवाच