Mahabharata Adhyaya 152
Adi ParvaAdhyaya 15237 Verses

Adhyaya 152

बकवधोत्तर-प्रशमनम् | Post-slaying Stabilization after Baka’s Death

Upa-parva: Baka-vadha (Ekacakrā Episode) — within Ādi Parva

Vaiśaṃpāyana narrates the immediate aftermath of Baka’s death. The rākṣasas who had been alarmed by the commotion emerge in panic; Bhīma, described as powerful and foremost among strikers, reassures them and imposes a binding condition: they are not to harm humans henceforth, with the stated consequence that violence will lead swiftly to their destruction. The rākṣasas accept the compact, after which they are said to appear ‘gentle’ and become visible in the city without provoking fear. Bhīma then transports the slain man-eater, places the body at the city gate as public evidence, and departs unnoticed. He reports the full account to the king. At dawn, townspeople discover the bloodied corpse, compare its mass to a mountain peak, and relay the news to Ekacakrā. Large crowds—men, women, elders, and children—assemble to witness the outcome, respond with astonishment, and perform worship toward the divine. The citizens then calculate whose turn it had been to provide the food-tribute, identify the brāhmaṇa household involved, and question him. The brāhmaṇa, protecting the Pāṇḍavas, attributes the deliverance to a mantra-accomplished, mighty brāhmaṇa who promised to deliver the food without fear, implying a public-facing explanation that preserves the Pāṇḍavas’ concealment. The wider countryside gathers to see the marvel, while the Pārthas remain resident there.

Chapter Arc: गहन वन में अज्ञात अतिथियों की गंध पाकर नरभक्षी राक्षस हिडिम्ब जाग उठता है—उसकी भूख और क्रूरता ही कथा का प्रथम शंखनाद बनती है। → हिडिम्ब अपनी बहन हिडिम्बा को आदेश देता है कि वह जाकर देखे ये कौन लोग हैं, और उन्हें मारकर उसके पास ले आए। हिडिम्बा वन में पहुँचकर पाण्डवों को देखती है; एक ओर भाई का भय और आज्ञा, दूसरी ओर इन मनुष्यों के प्रति उठती करुणा/आकर्षण—उसका अंतर्द्वंद्व तनाव को तीखा करता है। → हिडिम्बा भाई की आज्ञा मानने से इंकार करती है और उसके पराक्रम-गर्व को चुनौती देती है—वह कहती है कि राक्षस, मनुष्य, गन्धर्व, यक्ष कोई भी उसके (भीम के) पराक्रम को सह नहीं सकेगा; और यदि चाहे तो स्वयं जाकर या भाई को भेजकर देख ले। → हिडिम्बा का निर्णय स्पष्ट हो जाता है: वह पाण्डवों की ओर झुकती है और हिडिम्ब के नरसंहार-आदेश के विरुद्ध खड़ी होती है, जिससे आगामी संघर्ष की भूमि तैयार होती है। → हिडिम्ब को उकसाकर/ललकारकर हिडिम्बा संकेत देती है कि अब मुठभेड़ अवश्यंभावी है—क्या नरभक्षी राक्षस स्वयं आएगा, और पाण्डवों की रक्षा कैसे होगी?

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जद्ुगृहपर्वमें भीमसेनके जल ले आनेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १५० ॥/ ऑपन-आ क्र बछ। अर क्ज (हिडिम्बवधपर्व) एकपज्चाशदधिकशततमो< ध्याय: हिडिम्बके भेजनेसे हिडिम्बा राक्षसीका पाण्डवोंके पास आना और भीमसेनसे उसका वार्तालाप वैशम्पायन उवाच तत्र तेषु शयानेषु हिडिम्बो नाम राक्षस: । अविदूरे वनात्‌ तस्माच्छालवृक्षं समाश्रित:

वैशम्पायन बोले—जनमेजय! जब कुन्ती सहित पाण्डव वहाँ सो रहे थे, तब उस वन से कुछ ही दूर शालवृक्ष का आश्रय लिये हिडिम्ब नामक एक राक्षस रहता था।

Verse 2

क्रूरो मानुषमांसादो महावीर्यपराक्रम: । प्रावड्जलधरश्याम: पिज्ञाक्षो दारुणाकृति:

वह अत्यन्त क्रूर, मनुष्यमांस भक्षण करनेवाला, महान् बल-पराक्रम से युक्त था। वर्षाकाल के मेघ के समान श्याम, पिंगल नेत्रोंवाला और दारुण आकृति का था।

Verse 3

दंष्टाकरालवदन: पिशितेप्सु: क्षुधार्दित: । लम्बस्फिग्लम्बजठरो रक्तश्मश्रुशिरोरुह:

उसका मुख बड़ी-बड़ी दाढ़ों से विकराल था; वह मांस का लोभी और भूख से व्याकुल था। उसके नितम्ब और उदर लम्बे थे; दाढ़ी-मूँछ और सिर के बाल रक्तवर्ण थे।

Verse 4

महावृक्षगलस्कन्ध: शड्कुकर्णो बिभीषण: । यदृच्छया तानपश्यत्‌ पाण्डुपुत्रान्‌ महारथान्‌

उसका गला और कंधे महान् वृक्ष के समान जान पड़ते थे। दोनों कान भाले के समान लम्बे और नुकीले थे। वह देखने में बड़ा भयानक था। दैवेच्छा से उसकी दृष्टि उन महारथी पाण्डवों पर पड़ी।

Verse 5

विरूपरूप: पिड़ाक्ष: करालो घोरदर्शन: । पिशितेप्सु: क्षुधार्तश्न॒ तानपश्यद्‌ यदृच्छया

बेडौल रूप तथा भूरी आँखोंवाला वह विकराल राक्षस देखने में बड़ा डरावना था। भूख से व्याकुल होकर वह कच्चा मांस खाना चाहता था। उसने अकस्मात् पाण्डवों को देख लिया।

Verse 6

कक ऑिक । | ५ ४2-- “+ हक 8 न ; | 3 ६ े दर जज ब्द्ध दर 3 <#्नड)/2)॥29क- [] ७.९ ५५०९५... (९! ५३ ऊर्ध्वाड्गुलि: स कण्डूयन्‌ धुन्वन्‌ रूक्षान्‌ शिरोरुहान्‌ जृम्भमाणो महावकत्र: पुन: पुनरवेक्ष्य च

तब अंगुलियों को ऊपर उठाकर सिर के रूखे बालों को खुजलाता और फटकारता हुआ वह विशाल मुखवाला राक्षस पाण्डवों की ओर बार-बार देखकर जँभाई लेने लगा।

Verse 7

हृष्टो मानुषमांसस्थ महाकायो महाबल: । आध्राय मानुषं गन्धं भगिनीमिदमब्रवीत्‌

मनुष्य का मांस मिलने की सम्भावना से उसे बड़ा हर्ष हुआ। उस महाबली विशालकाय राक्षस ने मनुष्य की गन्ध पाकर अपनी बहिन से इस प्रकार कहा—

Verse 8

उपपन्नश्चिरस्याद्य भक्षो5यं मम सुप्रिय: । स्नेहस्रवान्‌ प्रस्रवति जिह्दा पर्येति मे सुखम्‌

“आज बहुत दिनों के बाद ऐसा भोजन मिला है, जो मुझे बहुत प्रिय है। इस समय मेरी जीभ लार टपका रही है और बड़े सुख से लप-लप कर रही है।”

Verse 9

अष्टौ दंष्टा: सुतीक्ष्णाग्राश्चिरस्पापातदुस्सहा: । देहेषु मज्जयिष्यामि स्निग्धेषु पिशितेषु च

Vaiśampāyana said: “Today I shall plunge my eight fangs—whose tips are exceedingly sharp and whose blow has long been unbearable—into human bodies and into slick flesh.” The line conveys a vow of predatory violence, foregrounding the ethical contrast between dharma and the destructive impulses that drive beings toward cruelty.

Verse 10

आक्रम्य मानुषं कण्ठमाच्छिद्य धमनीमपि । उष्णं नवं प्रपास्यामि फेनिलं रुधिरं बहु,“मैं मनुष्यकी गर्दनपर चढ़कर उसकी नाड़ियोंको काट दूँगा और उसका गरम-गरम, फेनयुक्त तथा ताजा खून खूब छककर पीऊँगा

Vaiśaṃpāyana said: “Trampling upon a man’s throat and severing even his vital vessels, I shall drink deeply of his hot, fresh blood—frothing and in great quantity.” The utterance conveys a deliberate vow of extreme violence, marking a collapse of restraint and a stark violation of dharma through bloodthirsty intent.

Verse 11

गच्छ जानीहि के त्वेते शेरते वनमाश्रिता: । मानुषो बलवान गन्धो पघ्राणं तर्पपतीव मे,“बहिन! जाओ, पता तो लगाओ, ये कौन इस वनमें आकर सो रहे हैं? मनुष्यकी तीव्र गन्ध आज मेरी नासिकाको मानो तृप्त किये देती है

Vaiśampāyana said: “Go and find out who these are, lying asleep here after taking refuge in the forest. A strong human scent reaches me, as though it were gratifying my sense of smell.”

Verse 12

हत्वैतान्‌ मानुषान्‌ सर्वानानयस्व ममान्तिकम्‌ | अस्मद्विषयसुप्ते भ्यो नैतेभ्यो भयमस्ति ते

Vaiśampāyana said: “Having slain all these men, bring them to me. They are asleep within our own domain; therefore you have no cause to fear them at all.” The line reflects a morally troubling command: the speaker frames the victims’ vulnerability and the safety of the setting as justification for violence, highlighting the abuse of power and the erosion of kṣatriya ethics when killing the unprepared is treated as permissible.

Verse 13

एषामुत्कृत्य मांसानि मानुषाणां यथेष्टत: । भक्षयिष्याव सहितौ कुरु तूर्ण वचो मम,'फिर हम दोनों एक साथ बैठकर इन मनुष्योंके मांस नोच-नोचकर जी-भर खायेंगे। तुम मेरी इस आज्ञाका तुरंत पालन करो

Vaiśampāyana said: “Tearing off the flesh of these humans as we please, we two shall eat our fill together. Therefore, carry out my command at once.” The line conveys a deliberate, predatory intent and highlights a stark collapse of ethical restraint, presenting violence not as necessity but as willed cruelty.

Verse 14

भक्षयित्वा च मांसानि मानुषाणां प्रकामत: । नृत्याव सहितावावां दत्ततालावनेकश:,“इच्छानुसार मनुष्यमांस खाकर हम दोनों ताल देते हुए साथ-साथ अनेक प्रकारके नृत्य करें!

मनुष्यों का मांस इच्छानुसार तृप्ति तक खाकर, आओ हम दोनों साथ-साथ तालियाँ बजाते हुए अनेक प्रकार के नृत्य करें।

Verse 15

एवमुक्ता हिडिम्बा तु हिडिम्बेन तदा वने । भ्रातुर्वचनमाज्ञाय त्वरमाणेव राक्षसी

वन में हिडिम्ब के ऐसा कहने पर राक्षसी हिडिम्बा ने भाई की आज्ञा मान ली और उतावली-सी होकर तुरंत उसी स्थान की ओर दौड़ी जहाँ पाण्डव थे। वहाँ पहुँचकर उसने कुन्ती सहित पाण्डवों को सोते देखा और किसी से परास्त न होने वाले भीमसेन को जागते हुए पहरा देते पाया।

Verse 16

जगाम तत्र यत्र सम पाण्डवा भरतर्षभ । ददर्श तत्र सा गत्वा पाण्डवान्‌ पृथया सह | शयानान्‌ भीमसेनं च जाग्रतं त्वपराजितम्‌

भरतश्रेष्ठ! वह उसी स्थान को गई जहाँ पाण्डव थे। वहाँ पहुँचकर उसने पृथाः (कुन्ती) सहित पाण्डवों को सोते हुए और अपराजित भीमसेन को जागते हुए पहरा देते देखा।

Verse 17

दृष्टवैव भीमसेनं सा शालपोतमिवोदगतम्‌ । राक्षसी कामयामास रूपेणाप्रतिमं भुवि

धरती पर उगे हुए शाल-वृक्ष के कोमल पौधे-सा मनोहर भीमसेन को देखते ही वह राक्षसी उन पर मोहित होकर उन्हें चाहने लगी; इस पृथ्वी पर उनके रूप की उपमा नहीं थी।

Verse 18

अयं श्यामो महाबाहु: सिंहस्कन्धो महाद्युति: । कम्बुग्रीव: पुष्कराक्षो भर्ता युक्तो भवेन्‍न्मम

उसने मन-ही-मन सोचा—“यह श्यामवर्ण तरुण वीर महाबाहु है, सिंह-स्कन्ध है और महान् तेजस्वी है। इसकी ग्रीवा शंख-सी सुन्दर है और नेत्र कमलदल-से विशाल हैं। यह मेरे लिए उपयुक्त पति हो सकता है।”

Verse 19

नाहं भ्रातृवचो जातु कुर्या क्रू्रोपसंहितम्‌ । पतिस्नेहो&तिबलवान्‌ न तथा भ्रातृसौहदम्‌

मैं अपने भाई की ऐसी आज्ञा का, जो क्रूरता से युक्त हो, कभी पालन नहीं करूँगी। स्त्री के हृदय में पति-प्रेम अत्यन्त प्रबल होता है; भाई का स्नेह उसके तुल्य नहीं।

Verse 20

मुहूर्तमेव तृप्तिश्न भवेद्‌ भ्रातुर्ममैव च । हतैरेतैरहत्वा तु मोदिष्ये शाश्व॒ती: समा:

इनको मार देने पर इनके मांस से मुझे और मेरे भाई को केवल क्षणभर की तृप्ति मिलेगी; पर यदि मैं इन्हें न मारूँ, तो इनके साथ अनेक वर्षों तक आनन्दित रहूँगी।

Verse 21

सा कामरूपिणी रूपं कृत्वा मानुषमुत्तमम्‌ | उपतस्थे महाबाहुं भीमसेनं शनै: शनै:

इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली हिडिम्बा ने उत्तम मानुषी रूप बनाया और लज्जित युवती की भाँति धीरे-धीरे महाबाहु भीमसेन के पास जा पहुँची।

Verse 22

लज्जमानेव ललना दिव्याभरणभूषिता । स्मितपूर्वमिदं वाक्यं भीमसेनमथाब्रवीत्‌

दिव्य आभूषणों से विभूषित वह ललना मानो लज्जित हो, मुसकराकर भीमसेन से यह वचन बोली।

Verse 23

कुतस्त्वमसि सम्प्राप्त: कश्नासि पुरुषर्षभ । क इमे शेरते चेह पुरुषा देवरूपिण:

हे पुरुषश्रेष्ठ! आप कहाँ से यहाँ आये हैं, और आप कौन हैं? तथा ये देवतुल्य रूपवाले पुरुष कौन हैं, जो यहाँ सो रहे हैं?

Verse 24

केयं वै बृहती श्यामा सुकुमारी तवानघ । शेते वनमिदं प्राप्य विश्वस्ता स्वगृहे यथा

वैशम्पायन बोले—हे अनघ! यह कौन है—श्यामवर्णा, दीर्घकाय और सुकुमारी कन्या—जो इस वन में आकर भी अपने ही घर की भाँति निश्चिन्त होकर सो रही है?

Verse 25

नेदं जानाति गहन वन राक्षससेवितम्‌ | वसति हात्र पापात्मा हिडिम्बो नाम राक्षस:,“इन्हें यह पता नहीं है कि यह गहन वन राक्षसोंका निवासस्थान है। यहाँ हिडिम्ब नामक पापात्मा राक्षस रहता है

वैशम्पायन बोले—इन्हें यह ज्ञात नहीं कि यह गहन वन राक्षसों से सेवित और आवासित है। यहाँ हिडिम्ब नाम का पापात्मा राक्षस रहता है।

Verse 26

तेनाहं प्रेषिता क्रात्रा दुष्टभावेन रक्षसा । बिभक्षयिषता मांसं युष्माकममरोपम,“वह मेरा भाई है। उस राक्षसने दुष्टभावसे मुझे यहाँ भेजा है। देवोपम वीर! वह आपलोगोंका मांस खाना चाहता है

वह मेरा भाई है। उस दुष्टभाव वाले राक्षस ने क्रोधपूर्वक मुझे यहाँ भेजा है। हे देवोपम वीर! वह आप लोगों का मांस भक्षण करना चाहता है।

Verse 27

साहं त्वामभिसम्प्रेक्ष्य देवगर्भसमप्रभम्‌ । नान्‍्यं भर्तारमिच्छामि सत्यमेतद्‌ ब्रवीमि ते

आपका तेज देवकुमारों के समान है। आपको देखकर अब मैं किसी अन्य को अपना पति नहीं चाहती। यह सत्य बात मैं आपसे कहती हूँ।

Verse 28

एतद्‌ विज्ञाय धर्मज्ञ युक्ते मयि समाचर | कामोपहतचित्ताड़ीं भजमानां भजस्व माम्‌

हे धर्मज्ञ! यह जानकर मेरे प्रति उचित आचरण कीजिए। काम ने मेरे तन-मन को व्याकुल कर दिया है; मैं आपकी शरण में आई सेविका हूँ—आप मुझे स्वीकार कीजिए।

Verse 29

त्रास्यामि त्वां महाबाहो राक्षसात्‌ पुरुषादकात्‌ | वत्स्यावो गिरिदुर्गेषु भर्ता भव ममानघ

वैशम्पायन बोले— “महाबाहो! मैं उस नरभक्षी राक्षस से तुम्हारी रक्षा करूँगी। आओ, हम दोनों दुर्गम पर्वत-दुर्गों और कन्दराओं में साथ निवास करें। अनघ! तुम मेरे पति बनो।”

Verse 30

(इच्छामि वीर भद्र| ते मा मा प्राणा विहासिषु: । त्वया हाहं परित्यक्ता न जीवेयमरिंदम ।।

वैशम्पायन बोले— “वीर! मैं तुम्हारा कल्याण चाहती हूँ। ऐसा न हो कि तुम्हारे तिरस्कार से मेरे प्राण ही मुझे छोड़ दें। अरिंदम! यदि तुमने मुझे त्याग दिया तो मैं जीवित नहीं रह सकूँगी। मैं आकाशगामिनी हूँ; जहाँ इच्छा हो, वहाँ विचर सकती हूँ। आओ—मेरे साथ भिन्न-भिन्न लोकों और प्रदेशों में विहार करके अनुपम आनन्द प्राप्त करो।”

Verse 31

भीमसेन उवाच (एष ज्येष्ठो मम भ्राता मान्य: परमको गुरु: । अनिविष्ट क्ष॒ तन्माहं परिविद्यां कथंचन ।।

भीमसेन बोले— “राक्षसी! यह मेरा ज्येष्ठ भ्राता है—मेरे लिए परम माननीय, सर्वोच्च गुरु। इनका अभी विवाह नहीं हुआ है; इसलिए मैं किसी प्रकार ‘उनसे पहले विवाह करने वाला’ नहीं बन सकता। राक्षसी! इस जगत में समर्थ होते हुए भी कौन ऐसा मनुष्य होगा जो सुख से सोए हुए इन—माता और भाइयों को, विशेषकर ज्येष्ठ भ्राता को—असुरक्षित छोड़कर चला जाए?”

Verse 32

को हि सुप्तानिमान्‌ भ्रातृन्‌ दत्त्वा राक्षमभोजनम्‌ | मातरं च नरो गच्छेत्‌ कामार्त इव मद्विध:

“मुझ-जैसा कौन पुरुष, कामपीड़ित की भाँति, इन सोए हुए भाइयों और माता को राक्षस का भोजन बनाकर कहीं और जा सकता है?”

Verse 33

राक्षस्युवाच यत्‌ ते प्रियं तत्‌ करिष्ये सव॒नितान्‌ प्रबोधय । मोक्षयिष्याम्यहं काम राक्षसात्‌ पुरुषादकात्‌

राक्षसी बोली— “जो तुम्हें प्रिय लगे, वही मैं करूँगी। स्त्रियों सहित इन सबको जगा दो। तुम्हारी इच्छा के अनुसार मैं इन सबको उस नरभक्षी राक्षस से छुड़ा दूँगी।”

Verse 34

भीमसेन उवाच सुखसुप्तान्‌ तू के म्सेअक [_ मातरं चैव राक्षसि । न भयाद्‌ बो भ्रातुस्तव दुरात्मन:

भीमसेन ने कहा—राक्षसी! मेरे भाई और माता इस वन में सुखपूर्वक सो रहे हैं। तुम्हारे दुरात्मा भाई के भय से मैं उन्हें जगाऊँगा नहीं।

Verse 35

न हि मे राक्षसा भीरु सोढुं शक्ता: पराक्रमम्‌ । न मनुष्या न गन्धर्वा न यक्षाश्चवारुलोचने,भीरु! सुलोचने! मेरे पराक्रमको राक्षस, मनुष्य, गन्धर्व तथा यक्ष भी नहीं सह सकते हैं

भीरु! सुलोचने! मेरे पराक्रम को राक्षस नहीं सह सकते; न मनुष्य, न गन्धर्व और न ही यक्ष।

Verse 36

गच्छ वा तिष्ठ वा भद्रे यद्‌ वापीच्छसि तत्‌ कुरु । तं वा प्रेषय तन्वज्धि भ्रातरं पुरुषादकम्‌

अतः भद्रे! तुम जाओ या रहो—जैसी इच्छा हो वैसा करो। अथवा, तन्वंगी! यदि चाहो तो अपने नरमांसभक्षी भाई को ही भेज दो।

Verse 151

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि हिडिम्बवधपर्वणि भीमहिडिम्बासंवादे एकपज्चाशदधिकशततमो<ध्याय:

इस प्रकार श्रीमहाभारत के आदिपर्व के हिडिम्बवधपर्व में भीम-हिडिम्बा संवाद के अंतर्गत एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

How to convert a violent, fear-based local order into stable civic safety: Bhīma must prevent further harm while avoiding indiscriminate retaliation and simultaneously protect the concealed status of the Pāṇḍavas.

Effective protection combines force with restraint and post-conflict governance: security is completed not merely by removing a threat but by establishing enforceable norms (saṃvida) and calming collective fear.

No explicit phalaśruti is stated; the chapter functions as pragmatic meta-commentary by showing how public evidence, communal verification, and controlled narration preserve social order and safeguard vulnerable actors.

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