Mahabharata Adhyaya 137
Adi ParvaAdhyaya 13726 Verses

Adhyaya 137

Jatugṛha-dāhānantara-vṛttāntaḥ (Aftermath of the Lac House Fire)

Upa-parva: Jatugṛha-dāha Parva (The Lac House Burning Episode)

Vaiśaṃpāyana reports that, after the night passes, the townspeople arrive swiftly to see the Pāṇḍavas. They attempt to extinguish the blaze and observe the lac house burned, along with Purocana. Public outcry attributes the act to Duryodhana, with suspicion extending to Dhṛtarāṣṭra’s foreknowledge and to senior figures’ failure to restrain wrongdoing. Amid the search, they notice the burned Niṣādī woman and her five sons; a concealed tunnel entrance, covered by dust and unnoticed by others, is referenced through the digger’s activity. Messengers report to Dhṛtarāṣṭra that the Pāṇḍavas and Purocana have perished. Dhṛtarāṣṭra laments, orders immediate dispatch to Vāraṇāvata, and instructs that funerary honors and memorial constructions be performed for the presumed dead, including Kuntī. He performs udaka rites, while the Kauravas grieve; Vidura’s restrained sorrow is noted as informed by deeper knowledge. In parallel, the Pāṇḍavas have already left Vāraṇāvata quickly, moving south by night using the stars for navigation, entering a dense forest. Exhausted, thirsty, and disoriented, they appeal to Bhīma; at Yudhiṣṭhira’s request, Bhīma lifts Kuntī and his brothers and carries them onward to maintain concealment and safety.

Chapter Arc: रंगभूमि में अस्त्र-प्रदर्शन की धूम के बीच कर्ण का तेजस्वी प्रवेश—और उसी क्षण उसकी जाति पर उठता प्रश्न, जो वीरता को भी कठघरे में खड़ा कर देता है। → कर्ण धनुष उठाकर अर्जुन को ललकारता है; सभा में कौतूहल और प्रतिस्पर्धा उफनती है। तभी अधिरथ (रथसारथि) का आगमन होता है; कर्ण पितृ-गौरव से बँधकर धनुष त्यागता, सिंहासन से उतरकर प्रणाम करता है। भीमसेन उसे ‘सूतपुत्र’ मानकर उपहास-भरे वचन कहता है; दर्शक दलों में बँटकर ‘अर्जुन-कर्ण-दुर्योधन’ के नाम पुकारते हैं। → अधिरथ के सामने कर्ण का विनय—धनुष छोड़कर शिर झुकाना—और उसी विनय को सभा द्वारा ‘नीच कुल’ का प्रमाण मानकर तिरस्कार में बदल देना; इसी क्षण दुर्योधन कर्ण को मित्र-रूप में पाकर निर्भय होता है और कर्ण की प्रतिष्ठा का प्रश्न राजनीतिक रंग ले लेता है। → कर्ण अपने शस्त्र-परिश्रम और आत्मविश्वास के बल पर दुर्योधन से संवाद करता है; सभा में यह धारणा जमती है कि धनुर्धरों में कर्ण की तुलना का कोई नहीं—और दुर्योधन-कर्ण की मैत्री सार्वजनिक रूप से दृढ़ हो जाती है, जिससे अर्जुन-पक्ष का गर्व और कौरव-पक्ष की आकांक्षा दोनों तीव्र होते हैं। → प्रतिभा बनाम जन्म का यह संघर्ष अब राजसत्ता और भविष्य की शत्रुता में कैसे बदलेगा—और कर्ण किस पक्ष का ध्वज बनेगा?

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्या भारत आदिपव॑ीके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें कर्णके राज्याथिषेकसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय प्रा हुआ ॥/ १३५ ॥। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २६ श्लोक मिलाकर कुल ४३३ “लोक हैं) न२््च्य्निनाय्ि श््य नी्-नत्तज्स षट्त्रिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: भीमसेनके द्वारा कर्णका तिरस्कार और दुर्योधनद्वारा उसका सम्मान वैशम्पायन उवाच ततः स्रस्तोत्तरपट: सप्रस्वेद: सवेपथु: । विवेशाधिरथो रऊझूं यष्टिप्राणो ह्वयन्निव

वैशम्पायन बोले—तत्पश्चात् अधिरथ रंगभूमि में प्रविष्ट हुआ। उसका ऊपरी वस्त्र खिसक गया था, वह पसीने से भीगा और काँपता हुआ था। लाठी को मानो प्राणों का सहारा बनाकर, वह कर्ण को पुकारता हुआ-सा भीतर आया।

Verse 2

तमालोक्य धनुस्त्यक्त्वा पितृगौरवयन्त्रित: । कर्णोडभिषेकार्दशिरा: शिरसा समवन्दत

उसे देखते ही पितृगौरव से बँधा कर्ण धनुष त्यागकर नीचे उतर आया। अभिषेक-जल से भीगे मस्तक सहित उसने सिर झुकाकर अधिरथ को प्रणाम किया।

Verse 3

ततः पादाववच्छाद्य पटान्तेन ससम्भ्रम: । पुत्रेति परिपूर्णार्थमब्रवीद्‌ रथसारथि:,अधिरथने अपने दोनों पैरोंको कपड़ेके छोरसे छिपा लिया और “बेटा! बेटा!” पुकारते हुए अपनेको कृतार्थ समझा

तब रथसारथि अधिरथ ने घबराकर वस्त्र के छोर से अपने दोनों पाँव ढँक लिए और “बेटा! बेटा!” कहकर पुकार उठा; उसे लगा मानो उसका जीवन-कार्य पूर्ण हो गया।

Verse 4

परिष्वज्य च तस्याथ मूर्धानं स्‍्नेहविक्लव: । अंगराज्याभिषेकार्द्रम श्रुभि: सिषिचे पुन:

फिर स्नेह से विह्वल होकर उसने कर्ण को गले लगा लिया और अंगराज्य के अभिषेक से भीगे उसके मस्तक को अपने आँसुओं से पुनः अभिषिक्त कर दिया।

Verse 5

त॑ दृष्टवा सूतपुत्रो5यमिति संचिन्त्य पाण्डव: । भीमसेनस्तदा वाक्यमतब्रवीत्‌ प्रहसन्निव,अधिरथको देखकर पाण्डुकुमार भीमसेन यह समझ गये कि कर्ण सूतपुत्र है; फिर तो वे हँसते हुए-से बोले--

उसे देखकर पाण्डव भीमसेन ने मन में विचार किया—“यह तो सूतपुत्र है।” फिर वे मानो हँसते हुए उससे बोले।

Verse 6

न त्वमर्हसि पार्थेन सूतपुत्र रणे वधम्‌ । कुलस्य सदृशस्तूर्ण प्रतोदो गृह्मुतां त्वया

अरे सूतपुत्र! तू पार्थ (अर्जुन) के हाथों रण में मारे जाने योग्य नहीं है। शीघ्र ही चाबुक उठा ले—यही तेरे कुल के अनुरूप है।

Verse 7

अड्डराज्यं च ना्हस्त्वमुपभोक्तुं नराधम । था हुताशसमीपस्थं पुरोडाशमिवाध्वरे,“नराधम! जैसे यज्ञमें अग्निके समीप रखे हुए पुरोडाशको कुत्ता नहीं पा सकता, उसी प्रकार तू भी अंगदेशका राज्य भोगनेयोग्य नहीं है”

नराधम! तू अंगदेश के राज्य का भोग करने योग्य नहीं है; जैसे यज्ञ में अग्नि के पास रखा पुरोडाश कुत्ता नहीं पा सकता, वैसे ही तू भी उस राज्य के योग्य नहीं।

Verse 8

एवमुक्तस्तत: कर्ण: किंचित्प्रस्फुरिताधर: । गगनस्थं विनि:श्वस्य दिवाकरमुदैक्षत

ऐसा कहे जाने पर कर्ण का अधर क्रोध से कुछ काँप उठा। उसने लंबी साँस ली और आकाश में स्थित दिवाकर सूर्य की ओर देखा।

Verse 9

ततो दुर्योधन: कोपादुत्पपात महाबल: । भ्रातृपड्मवनात्‌ तस्मान्मदोत्कट इव द्विप:,इसी समय महाबली दुर्योधन कुपित हो मदोन्मत्त गजराजकी भाँति भ्रातृसमूहरूपी कमलवनसे उछलकर बाहर निकल आया

तभी महाबली दुर्योधन क्रोध से उछल पड़ा; वह अपने भाइयों के कमलवन-से समूह से मदोन्मत्त गजराज की भाँति बाहर निकल आया।

Verse 10

सो<ब्रवीद्‌ भीमकर्माणं भीमसेनमवस्थितम्‌ । वृकोदर न युक्त ते वचन वक्तुमीदूशम्‌,उसने वहाँ खड़े हुए भयंकर कर्म करनेवाले भीमसेनसे कहा--“वृकोदर! तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये”

वहाँ खड़े हुए भयंकर कर्मों वाले भीमसेन से उसने कहा— “वृकोदर! तुम्हें ऐसी बात कहना उचित नहीं है।”

Verse 11

क्षत्रियाणां बल॑ ज्येष्ठं योद्धव्यं क्षत्रबन्धुना । शूराणां च नदीनां च दुर्विदा: प्रभवा: किल

क्षत्रियों में बल ही प्रधान माना गया है; अवसर आने पर क्षत्रबन्धु (नाममात्र क्षत्रिय) से भी युद्ध करना चाहिये। और शूरवीरों तथा नदियों की वास्तविक उत्पत्ति जानना सचमुच कठिन कहा गया है।

Verse 12

सलिलादुत्थितो वल्लियेन व्याप्तं चराचरम्‌ । दधीचस्यास्थितो वज्ं कृतं दानवसूदनम्‌

जल से प्रकट हुआ वह तेजस्वी अग्नि सम्पूर्ण चराचर जगत् में व्याप्त है; और दानवों का संहार करने वाला वज्र महर्षि दधीचि की अस्थियों से निर्मित हुआ।

Verse 13

आग्नेय: कृत्तिकापुत्रो रौद्रो गाज़ेय इत्यपि | श्रूयते भगवान्‌ देव: सर्वगुह्ममयों गुहः,“सुना जाता है, सर्वगुह्म॒स्वरूप भगवान्‌ स्कन्ददेव अग्नि, कृत्तिका, रुद्र तथा गंगा--इन सबके पुत्र हैं

भगवान् गुह (स्कन्द) को अग्नि-पुत्र, कृत्तिकाओं का पुत्र, रुद्र का पुत्र तथा गंगा का पुत्र—ऐसा भी सुना जाता है; वह समस्त गुह्य-तत्त्वों का स्वरूप है।

Verse 14

क्षत्रियेभ्यश्व ये जाता ब्राह्मणास्ते च ते श्रुता: । विश्वामित्रप्रभूतयः प्राप्ता ब्रह्म॒त्वमव्ययम्‌

क्षत्रियों से उत्पन्न हुए कितने ही ब्राह्मणों के विषय में तुमने भी सुना होगा; और विश्वामित्र आदि क्षत्रिय भी अक्षय ब्राह्मणत्व को प्राप्त हो चुके हैं।

Verse 15

आचार्य: कलशाज्जातो द्रोण: शस्त्रभूतां वर: । गौतमस्यान्ववाये च शरस्तम्बाच्च गौतम:

हमारे आचार्य द्रोण—शस्त्रविद्या में श्रेष्ठ—कलश से उत्पन्न हुए। और गौतम-वंश में भी कृप (गौतम) सरकंडों के गुच्छे से प्रकट हुए।

Verse 16

भवतां च यथा जन्म तदप्यागमितं मया । सकुण्डलं सकवचं सर्वलक्षणलक्षितम्‌ | कथमादित्यसदृशं मृगी व्यात्रं जनिष्यति

तुम सब भाइयों का जन्म जिस प्रकार हुआ, वह भी मुझे भली-भाँति ज्ञात है। और यह भी कि कर्ण—सूर्य के समान तेजस्वी—कुण्डल और कवच सहित, समस्त शुभ लक्षणों से चिह्नित होकर जन्मा। ऐसा आदित्य-तुल्य पुरुष सूत-जाति की स्त्री का पुत्र कैसे हो सकता है? क्या कोई हरिणी बाघ को जन्म दे सकती है?

Verse 17

(कथमादित्यसंकाशं सूतो5मुं जनयिष्यति । एवं क्षत्रगुणैर्युक्ते शूरं समितिशो भनम्‌ ।।

सूर्य-सदृश तेजस्वी इस वीर को—जो क्षत्रियोचित गुणों से युक्त और रणभूमि की शोभा है—कोई सूत कैसे उत्पन्न कर सकता है? यह नरश्रेष्ठ केवल अंग-राज्य का नहीं, समस्त पृथ्वी के राज्य का अधिकारी है—अपने बाहुबल से, और मेरे जैसे आज्ञापालक अनुचर के सहारे।

Verse 18

यस्य वा मनुजस्येद॑ न क्षान्तं मद्विचेष्टितम्‌ रथमारुहा[ पद्धयां स विनामयतु कार्मुकम्‌

जिस मनुष्य से मेरा यह आचरण सहा न जाए, वह रथ पर चढ़े और पैरों से दबाकर अपना धनुष झुकाए—युद्ध के लिए प्रस्तुत हो जाए।

Verse 19

ततः सर्वस्य रज्गस्य हाहाकारो महानभूत्‌ । साधुवादानुसम्बद्धः सूर्य श्षास्तमुपागमत्‌

तब समूचे रंगमण्डप में महान् हाहाकार मच गया, जो साधुवाद के साथ मिला-जुला था। और उसी समय सूर्य अस्ताचल को चला गया।

Verse 20

ततो दुर्योधन: कर्णमालम्ब्याग्रकरे नृप: । दीपिकाग्निकृतालोकस्तस्माद्‌ रड्भाद्‌ विनिर्यया,तब दुर्योधन कर्णके हाथकी अगुलियाँ पकड़कर मशालकी रोशनी करा उस रंगभूमिसे बाहर निकल गया

तब राजा दुर्योधन कर्ण के हाथ की उँगलियाँ पकड़कर, मशाल की अग्नि से मार्ग प्रकाशित कर, उस रंगभूमि से बाहर निकल गया।

Verse 21

पाण्डवाश्व सहद्रोणा: सकृपाश्न विशाम्पते । भीष्मेण सहिता: सर्वे ययु: स्वं स्‍्व॑ं निवेशनम्‌,राजन! समस्त पाण्डव भी द्रोण, कृपाचार्य और भीष्मजीके साथ अपने-अपने निवासस्थानको चल दिये

राजन्! तब समस्त पाण्डव, द्रोणाचार्य और कृपाचार्य के साथ, तथा भीष्मजी के संग, अपने-अपने निवासस्थान को चले गए।

Verse 22

अर्जुनेति जन: वलच्चित्‌ कश्चित्‌ कर्णेति भारत । वद्िद्‌ दुर्योधनेत्येवं ब्रुवन्त: प्रस्थितास्तदा,भारत! उस समय दर्शकोंमेंसे कोई अर्जुनकी, कोई कर्णकी और कोई दुर्योधनकी प्रशंसा करते हुए चले गये

भारत! तब लोग प्रस्थान करते हुए—कोई ‘अर्जुन!’ कहकर, कोई ‘कर्ण!’ कहकर, और कोई ‘दुर्योधन!’ कहकर—उनकी प्रशंसा करते चले गए।

Verse 23

कुन्त्याश्व प्रत्यभिज्ञाय दिव्यलक्षणसूचितम्‌ । पुत्रमज्ेश्वरं स्नेहाच्छन्ना प्रीतिरजायत

दिव्य लक्षणों से सूचित अपने पुत्र अंगराज कर्ण को पहचानकर कुन्ती के हृदय में स्नेहवश गहन प्रसन्नता उत्पन्न हुई; पर वह आनंद उसने छिपाए रखा।

Verse 24

दुर्योधनस्थापि तदा कर्णमासाद्य पार्थिव | भयमर्जुनसंजातं क्षिप्रमन्‍्तरधीयत,जनमेजय! उस समय कर्णको मित्रके रूपमें पाकर दुर्योधनका भी अर्जुनसे होनेवाला भय शीघ्र दूर हो गया

जनमेजय! उस समय मित्ररूप में कर्ण को पाकर दुर्योधन के मन में अर्जुन से उत्पन्न भय शीघ्र ही दूर हो गया।

Verse 25

स चापि वीर: कृतशस्त्रनिश्रम: परेण साम्नाभ्यवदत्‌ सुयोधनम्‌ । युधिष्ठटिरस्याप्यभवत्‌ तदा मति- न कर्णतुल्यो5स्ति धनुर्धर: क्षितो

शस्त्राभ्यास में अत्यन्त परिश्रम करने वाला वह वीर भी परम सौजन्य और सान्त्वनापूर्ण वचनों से सुयोधन से बोलने लगा। उसी समय युधिष्ठिर को भी यह निश्चय हो गया कि इस पृथ्वी पर कर्ण के समान कोई धनुर्धर नहीं है।

Verse 136

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि अस्त्रदर्शने षट्त्रिंयधिकशततमो<्ध्याय:

इस प्रकार श्रीमहाभारत के आदिपर्व के सम्भवपर्व में ‘अस्त्रदर्शन’ नामक एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

The chapter contrasts public dharmic expectation (accountability and protection of kin) with courtly ambiguity and indirect harm, raising the dilemma of how responsibility is assigned when violence is executed through intermediaries and misinformation.

It illustrates that ethical order depends not only on stated norms but on enforcement and restraint; when institutions fail to check covert wrongdoing, survival may require disciplined concealment and coordinated mutual protection.

No explicit phalaśruti appears here; the chapter functions as narrative-ethical documentation, emphasizing causality (karma in the sense of consequential action) and the interpretive gap between appearance (presumed deaths) and reality (escape).

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