Droṇotpattiḥ and Dhanurveda-Prāpti
Origin of Droṇa and Acquisition of Martial Science
अमाद्यदिन्द्र: सोमेन दक्षिणाभिद्धिजातय: । व्युषिताश्वस्य राजर्षेस्ततो यज्ञे महात्मन:,“उसमें देवराज इन्द्र सोमपान करके उन्मत्त हो उठे थे तथा ब्राह्मणलोग पर्याप्त दक्षिणा पाकर हर्षसे फूल उठे थे। महामना राजर्षि व्युषिताश्वके यज्ञमें उस समय देवता और ब्रह्मर्षि स्वयं सब कार्य कर रहे थे। राजन! इससे व्युषिताश्व सब मनुष्योंसे ऊँची स्थितिमें पहुँचकर बड़ी शोभा पा रहे थे
amādyad indraḥ somena dakṣiṇābhir dhijātayaḥ | vyuṣitāśvasya rājarṣes tato yajñe mahātmanaḥ ||
वैशम्पायन बोले—उस यज्ञ में देवराज इन्द्र सोमपान करके उन्मत्त हो उठे और द्विज ब्राह्मण प्रचुर दक्षिणा पाकर हर्षित हो गए। महात्मा राजर्षि व्युषिताश्व के उस यज्ञ में देवता और ब्रह्मर्षि मानो स्वयं ही समस्त कर्म और विधियाँ संपन्न कर रहे थे। इस प्रकार व्युषिताश्व मनुष्यों में सर्वोच्च प्रतिष्ठा पाकर अद्भुत शोभा से दीप्त हो उठे।
वैशम्पायन उवाच