Steya-doṣa-nirūpaṇa (On the Nature and Gravity of Theft) — within the Hayagrīva–Agastya Saṃvāda frame
काननं च क्षयं नीतं बहुसत्त्वसमाकुलम् / तेनाग्र्याणि महार्हाणि क्षेत्राण्यपि चकार सः
kānanaṃ ca kṣayaṃ nītaṃ bahusattvasamākulam / tenāgryāṇi mahārhāṇi kṣetrāṇyapi cakāra saḥ
बहुत-से प्राणियों से भरे वन को उसने नष्ट कर दिया; और उसी से उसने श्रेष्ठ, अत्यन्त मूल्यवान तीर्थ-क्षेत्र भी बनवाए।