Steya-doṣa-nirūpaṇa (On the Nature and Gravity of Theft) — within the Hayagrīva–Agastya Saṃvāda frame
इति श्रीब्रह्माण्डे महापुराणे उत्तरभागे हयग्रीवागस्त्यसंवादे ललितोपाख्याने हिंसाद्यस्वरूपकथनं नाम षष्ठो ऽध्यायः इन्द्र उवाच भगवन्सर्वमाख्यातं हिंसाद्यस्य तु लक्षणम् / स्तेयस्य लक्षणं किं वा तन्मे विस्तरतो वद
iti śrībrahmāṇḍe mahāpurāṇe uttarabhāge hayagrīvāgastyasaṃvāde lalitopākhyāne hiṃsādyasvarūpakathanaṃ nāma ṣaṣṭho 'dhyāyaḥ indra uvāca bhagavansarvamākhyātaṃ hiṃsādyasya tu lakṣaṇam / steyasya lakṣaṇaṃ kiṃ vā tanme vistarato vada
इस प्रकार श्रीब्रह्माण्ड महापुराण के उत्तरभाग में, हयग्रीव और अगस्त्य के संवाद में, ललितोपाख्यान के अंतर्गत ‘हिंसा आदि के स्वरूप का कथन’ नामक छठा अध्याय। इन्द्र बोले— भगवन्! आपने हिंसा आदि के लक्षण सब कह दिए; अब चोरी (स्तेय) का लक्षण क्या है, वह मुझे विस्तार से बताइए।