ललितोपाख्याने जप-न्यास-योगप्रकरणम्
Lalitopākhyāna: Procedure of Japa, Nyāsa, and Yogic Installation
सिंदूरकाञ्चनसमोभयभागमर्धनारीश्वरं गिरिसुताहरभूपचिह्नम् / पाशद्वयाक्षवलयेष्टदहस्तमेव स्मृत्वा न्यसेल्लिपिपदेषु समीहितार्थम्
siṃdūrakāñcanasamobhayabhāgamardhanārīśvaraṃ girisutāharabhūpacihnam / pāśadvayākṣavalayeṣṭadahastameva smṛtvā nyasellipipadeṣu samīhitārtham
सिंदूर और काञ्चन के समान दोनों भागों वाले अर्धनारीश्वर का स्मरण करे, जिन पर गिरिसुता और हर के भूषण-चिह्न हैं। दोनों पाश, अक्ष-माला और वरद-हस्त से युक्त उस देव को याद कर, इच्छित फल हेतु अक्षरों/पदों पर न्यास करे।