ललितोपाख्याने जप-न्यास-योगप्रकरणम्
Lalitopākhyāna: Procedure of Japa, Nyāsa, and Yogic Installation
चक्रेश्वरीं न्यसेच्चक्रं समर्प्य व्याप्य वर्ष्मणि / हृदि त्रिकोणं संभाव्य दिक्षु प्रागादितः क्रमात्
cakreśvarīṃ nyaseccakraṃ samarpya vyāpya varṣmaṇi / hṛdi trikoṇaṃ saṃbhāvya dikṣu prāgāditaḥ kramāt
चक्रेश्वरी का न्यास करके चक्र को समर्पित करे और उसे देह में व्याप्त करे। हृदय में त्रिकोण का भाव करके, दिशाओं में पूर्व से आरम्भ कर क्रमशः (न्यास) करे।