ललितोपाख्याने जप-न्यास-योगप्रकरणम्
Lalitopākhyāna: Procedure of Japa, Nyāsa, and Yogic Installation
इति श्रीब्रह्माण्डमहापुराणे उत्तरभागे ललितोपाख्याने त्रिचत्वारिंशो ऽध्यायः हयग्रीव उवाच प्रविश्य तु जपस्थानमानीय निजमासनम् / अभ्युक्ष्य विधिवन्मन्त्रैर्गुरूक्तक्रमयोगतः
iti śrībrahmāṇḍamahāpurāṇe uttarabhāge lalitopākhyāne tricatvāriṃśo 'dhyāyaḥ hayagrīva uvāca praviśya tu japasthānamānīya nijamāsanam / abhyukṣya vidhivanmantrairgurūktakramayogataḥ
इस प्रकार श्रीब्रह्माण्डमहापुराण के उत्तरभाग के ललितोपाख्यान में तैंतालीसवाँ अध्याय। हयग्रीव बोले— जप-स्थान में प्रवेश करके अपना आसन लाकर, गुरु के बताए क्रम के अनुसार मंत्रों से विधिपूर्वक उसे अभिमंत्रित कर शुद्ध किया।