Śrīcakra–Mantra–Pūjāvidhi: Agastya–Hayagrīva Saṃvāda
Lalitopākhyāna Context
अभ्यर्च्य चक्रमध्यस्थो मन्त्री चिन्तयते यदा / सर्वमात्मानमरुणं साध्यमप्यरुणीकृतम्
abhyarcya cakramadhyastho mantrī cintayate yadā / sarvamātmānamaruṇaṃ sādhyamapyaruṇīkṛtam
जब मन्त्रज्ञ चक्र के मध्य में स्थित होकर विधिपूर्वक अर्चना करके ध्यान करता है, तब वह अपने आत्मस्वरूप को अरुण (तेजस्वी) और साध्य को भी अरुणीकृत देखता है।