Śrī Kāmākṣī–Mahātripurasundarī: Immanence of Śakti and Cosmic Administration
Lalitopākhyāna
तन्निशम्य भृशं क्रोधमवाप त्रिपुरान्तकः / विष्णुमेवं तदालोक्य क्रोधेनैव विकारतः
tanniśamya bhṛśaṃ krodhamavāpa tripurāntakaḥ / viṣṇumevaṃ tadālokya krodhenaiva vikārataḥ
यह सुनकर त्रिपुरान्तक (शिव) अत्यंत क्रोधित हो गए। विष्णु को इस स्थिति में देखकर वे क्रोध के कारण विकराल रूप में परिवर्तित हो गए।