Pratisarga-pravartana (How Re-Creation Proceeds) / पुनःसर्ग-प्रवर्तन
सत्याभिध्यायिनस्तस्य ध्यायिनः सन्निमित्तकम् / रजः सत्त्वतमोव्यक्ता विधर्माणः परस्परम्
satyābhidhyāyinastasya dhyāyinaḥ sannimittakam / rajaḥ sattvatamovyaktā vidharmāṇaḥ parasparam
उस सत्य का ध्यान करने वाले ध्याता के लिए वही कारण बनता है; रज, सत्त्व और तम—ये प्रकट होकर परस्पर भिन्न-भिन्न स्वभावों से क्रिया करते हैं।