Pratisarga-pravartana (How Re-Creation Proceeds) / पुनःसर्ग-प्रवर्तन
प्रवृत्तिकाले रजसाभिपन्नो महत्त्वभूतादिविशेषतां च / विशेषतां चेन्द्रियतां च याति गुणावसानौषधिभिर्मनुष्यः
pravṛttikāle rajasābhipanno mahattvabhūtādiviśeṣatāṃ ca / viśeṣatāṃ cendriyatāṃ ca yāti guṇāvasānauṣadhibhirmanuṣyaḥ
प्रवृत्ति के समय रजस् से अभिभूत मनुष्य महत्तत्त्व, भूत आदि की विशेषता को प्राप्त होता है; और विशेषता से इन्द्रियत्व को भी—गुणों के परिणामरूपी औषधियों द्वारा।