दिक्पालादि-शिवलोकान्तर-कथनम्
Account of the Dikpālas and Intervening Realms toward Śiva’s Worlds
तत्र नौकासहस्रेण संचरन्त्यो मदोद्धताः / उपासते सदा सत्तं नौकास्थं कुसुमायुधम्
tatra naukāsahasreṇa saṃcarantyo madoddhatāḥ / upāsate sadā sattaṃ naukāsthaṃ kusumāyudham
वहाँ मद से उन्मत्त स्त्रियाँ हजारों नौकाओं में विचरती हुई, नौका पर स्थित कुसुमायुध (कामदेव) उस सत्-स्वरूप देव की सदा उपासना करती हैं।