दिक्पालादि-शिवलोकान्तर-कथनम्
Account of the Dikpālas and Intervening Realms toward Śiva’s Worlds
मार्तण्डभैरवस्तत्र भिन्नो द्वादशधा मुने / शक्तिभिस्तैजसीभिश्च कोटिसंख्याभिरन्वितः ३५।४५ / महाप्रकाशरूपश्च मदारुणविलोचनः / कङ्कोलितरुखण्डेषु नित्यं क्रीडारसोत्सुकः / वर्तते विन्ध्यदर्पारे पारे यस्तन्मयस्थितः
mārtaṇḍabhairavastatra bhinno dvādaśadhā mune / śaktibhistaijasībhiśca koṭisaṃkhyābhiranvitaḥ 35.45 / mahāprakāśarūpaśca madāruṇavilocanaḥ / kaṅkolitarukhaṇḍeṣu nityaṃ krīḍārasotsukaḥ / vartate vindhyadarpāre pāre yastanmayasthitaḥ
हे मुने! वहाँ मार्तण्ड-भैरव बारह रूपों में विभक्त है और कोटि-कोटि तेजस्वी शक्तियों से युक्त है। वह महाप्रकाश-स्वरूप, मद-अरुण नेत्रों वाला, कंकोलि-वृक्षों के उपवनों में नित्य क्रीड़ा-रस में रत रहता है; और विन्ध्य के उस पार दर्प-तट पर तन्मय होकर विराजमान है।