Amṛta-Manthana and Lalitā’s Mohinī Intervention
Amṛtamanthana-Prasaṅga
उमापि तं समोवेक्ष्य धावन्तं चात्मनः प्रियम् / स्वात्मानं स्वात्मर्सोन्दर्यं निन्दन्ती चातिविस्मिता / तस्थाववाङ्मुखी तूष्णीं लज्जासूयासमन्विता
umāpi taṃ samovekṣya dhāvantaṃ cātmanaḥ priyam / svātmānaṃ svātmarsondaryaṃ nindantī cātivismitā / tasthāvavāṅmukhī tūṣṇīṃ lajjāsūyāsamanvitā
उमा ने भी अपने प्रिय को दौड़ते हुए देखा; अत्यन्त विस्मित होकर वह अपने को और अपने सौन्दर्य को धिक्कारने लगी। फिर लज्जा और ईर्ष्या से युक्त, वह मौन होकर मुख झुकाए खड़ी रह गई।