Mānasasṛṣṭi-varṇana (Account of Mind-born Creation) | मानससृष्टिवर्णनम्
एवसुक्तो ऽब्रवीदेनं नाहं मृत्युजरान्विताः / प्रजाः स्रक्ष्यामि भद्रं ते स्थितो ऽहं त्वं सृज प्रभो
evasukto 'bravīdenaṃ nāhaṃ mṛtyujarānvitāḥ / prajāḥ srakṣyāmi bhadraṃ te sthito 'haṃ tvaṃ sṛja prabho
ऐसा कहे जाने पर उसने कहा—“तुम्हारा कल्याण हो; मैं मृत्यु और जरा से युक्त प्रजाओं की सृष्टि नहीं करूँगा। मैं स्थिर हूँ; हे प्रभो, तुम ही सृजन करो।”