Lokakalpanā / The Ordering of the Worlds
Cosmogony and Earth’s Retrieval
इति श्रीब्रह्माण्डे महापुराणे वायुप्रोक्ते पूर्वभागे प्रथमे प्रक्रियापदे लोककल्पनं नाम चतुर्थो ऽध्यायः श्रीसूत उवाच आपो ऽग्रे सर्वगा आसन्नेनसिमन्पृथिवीतले / शान्तवातैः प्रलीने ऽस्मिन्न प्राज्ञायत किञ्चन
iti śrībrahmāṇḍe mahāpurāṇe vāyuprokte pūrvabhāge prathame prakriyāpade lokakalpanaṃ nāma caturtho 'dhyāyaḥ śrīsūta uvāca āpo 'gre sarvagā āsannenasimanpṛthivītale / śāntavātaiḥ pralīne 'sminna prājñāyata kiñcana
इस प्रकार श्रीब्रह्माण्ड महापुराण के वायुप्रोक्त पूर्वभाग के प्रथम प्रक्रियापद में ‘लोककल्पन’ नामक चतुर्थ अध्याय। श्रीसूत ने कहा—आदि में जल ही सर्वत्र व्याप्त था; पृथ्वी-तल पर कोई सीमा न थी। शांत वायुओं में यह सब लीन था; तब कुछ भी ज्ञात न होता था।