यज्ञप्रवर्तनम् (Yajña-pravartana) — The Institution/Commencement of Sacrifice in Dvāpara
इति श्रीब्रह्माण्डे महापुराणे वायुप्रोक्ते पूर्वभागे द्वितीये ऽनुषङ्गपादे यज्ञप्रवर्त्तनं नाम त्रिशत्तमो ऽध्यायः सूत उवाच अत ऊर्द्धं प्रवक्ष्यामि द्वापरस्य विधिं पुनः / तत्र त्रेतायुगे क्षीणे द्वापरं प्रतिपद्यते
iti śrībrahmāṇḍe mahāpurāṇe vāyuprokte pūrvabhāge dvitīye 'nuṣaṅgapāde yajñapravarttanaṃ nāma triśattamo 'dhyāyaḥ sūta uvāca ata ūrddhaṃ pravakṣyāmi dvāparasya vidhiṃ punaḥ / tatra tretāyuge kṣīṇe dvāparaṃ pratipadyate
इस प्रकार श्रीब्रह्माण्ड महापुराण के वायुप्रोक्त पूर्वभाग के द्वितीय अनुषङ्गपाद में ‘यज्ञप्रवर्तन’ नामक तीसवाँ अध्याय। सूत बोले—अब आगे मैं द्वापर-युग की विधि फिर से कहूँगा; जब त्रेता-युग क्षीण होता है तब द्वापर का प्रवर्तन होता है।