Amāvasyā-Pitṛtarpaṇa: Purūravas and the Soma-Based Ancestral Offering (अमावस्या-पितृतर्पण / सोमतर्पण-विधि)
वैश्वरूप्यं तु सर्गस्य कथितं ह्येकदैशिकम् / न शक्यं परिसंख्यातुं श्रद्धेयं भूतिमिच्छता
vaiśvarūpyaṃ tu sargasya kathitaṃ hyekadaiśikam / na śakyaṃ parisaṃkhyātuṃ śraddheyaṃ bhūtimicchatā
सर्ग का यह विश्वरूप मैंने एक देश (एक अंश) में ही कहा है। इसे पूरी तरह गिन पाना संभव नहीं; जो कल्याण चाहता है, वह श्रद्धा से इसे माने।