Amāvasyā-Pitṛtarpaṇa: Purūravas and the Soma-Based Ancestral Offering (अमावस्या-पितृतर्पण / सोमतर्पण-विधि)
गृह्यते तु दिवा तस्मादमावास्यां दिवि क्षयाम् / कलानामपि चैतासां वृद्धिहान्या जलात्मनः
gṛhyate tu divā tasmādamāvāsyāṃ divi kṣayām / kalānāmapi caitāsāṃ vṛddhihānyā jalātmanaḥ
इसलिए अमावस्या में, आकाश में होने वाले क्षय को देखते हुए, दिन में ही ग्रहण किया जाता है। और जलस्वरूप चन्द्र की इन कलाओं में वृद्धि और हानि भी होती रहती है।