Nīlakaṇṭha-nāmotpatti-kathana
Origin of the Epithet “Nīlakaṇṭha”
प्रह्वाञ्जलिपुटौ भूत्वा तस्मै शर्वाय शूलिने / महाभैरवनादाय भीमरूपाय दंष्ट्रिणे / अव्यक्तायाथ महते नमस्कारं प्रकुर्वहे
prahvāñjalipuṭau bhūtvā tasmai śarvāya śūline / mahābhairavanādāya bhīmarūpāya daṃṣṭriṇe / avyaktāyātha mahate namaskāraṃ prakurvahe
हम दोनों झुककर अंजलि बाँधकर उस शर्व, शूलधारी को—महाभैरव-नाद वाले, भयानक रूप और दंष्ट्रा-युक्त—अव्यक्त और महान को नमस्कार करने लगे।