ध्रुवचर्याकीर्तनं / Dhruva-caryā-kīrtana
Account of Dhruva’s Course and Related Cosmological Ordering
सर्वतस्तेषु विस्तीर्णो वृत्ताकार इव स्थितः / बुद्धिबूर्वं भागवता कल्पदौ संप्रवर्त्तितः
sarvatasteṣu vistīrṇo vṛttākāra iva sthitaḥ / buddhibūrvaṃ bhāgavatā kalpadau saṃpravarttitaḥ
वह सब ओर उनमें विस्तृत होकर मानो वृत्ताकार स्थित है; और भगवत् द्वारा कल्प के आरम्भ में बुद्धिपूर्वक प्रवर्तित किया गया।