ध्रुवचर्याकीर्तनं / Dhruva-caryā-kīrtana
Account of Dhruva’s Course and Related Cosmological Ordering
वैद्युतेन समाविष्टो वार्ष्यो नाद्भिः प्रशाम्यति / मानवा नां च कुक्षिस्थो नाद्भिः शास्यति पावकः
vaidyutena samāviṣṭo vārṣyo nādbhiḥ praśāmyati / mānavā nāṃ ca kukṣistho nādbhiḥ śāsyati pāvakaḥ
जो अग्नि वैद्युत तेज से आविष्ट होकर वर्षा-रूप में प्रकट होता है, वह जल से शांत नहीं होता। और मनुष्यों के उदर में स्थित पावक भी जल से वश में नहीं होता।