Vasiṣṭha-gamana
Vasiṣṭha’s Departure / The Episode of Sagara
तथापि न दिवा भुक्तें शेते वा निशि संस्मरन् / सुदीर्घं निःश्वसित्युष्णमुद्विग्नहृदयो ऽनिशम्
tathāpi na divā bhukteṃ śete vā niśi saṃsmaran / sudīrghaṃ niḥśvasityuṣṇamudvignahṛdayo 'niśam
फिर भी वह दिन में न भोजन करता, न रात में सोता; स्मरण में डूबा रहता। व्याकुल हृदय वाला वह निरंतर गरम-गरम, दीर्घ श्वासें छोड़ता रहता।