Agastya’s Instruction on Bhakti and Mantra-Siddhi; Descent to Pātāla and the Hearing of Vaiṣṇavī Kathā
उवाच प्रणता भूयो ज्ञातुं कृष्णविचेष्टितम् / धरण्युवाच अलङ्कृतं जन्म पुंसामपि नन्दव्रजौकसाम्
uvāca praṇatā bhūyo jñātuṃ kṛṣṇaviceṣṭitam / dharaṇyuvāca alaṅkṛtaṃ janma puṃsāmapi nandavrajaukasām
प्रणाम कर उसने फिर कहा—मैं श्रीकृष्ण की लीलाएँ जानना चाहती हूँ। धरणी बोली—नन्द के व्रज में रहने वाले मनुष्यों का जन्म भी अलंकृत और धन्य हो गया।