Kārttavīrya–Paraśurāma-saṅgrāma-kathā
Sagara’s Inquiry and Vasiṣṭha’s Account
पुनः पप्रच्छ भक्तेस्तु लक्षणं प्रेमदायकम् / मृग्युवाच साधुकान्त महाभाग वचस्ते ऽलौकिकं प्रिय / र्हदृग् ज्ञानं तव कथं संजातं तद्वदाधुना
punaḥ papraccha bhaktestu lakṣaṇaṃ premadāyakam / mṛgyuvāca sādhukānta mahābhāga vacaste 'laukikaṃ priya / rhadṛg jñānaṃ tava kathaṃ saṃjātaṃ tadvadādhunā
फिर उसने भक्ति का वह लक्षण पूछा जो प्रेम देने वाला है। मृगी बोली—हे साधु-कान्त, महाभाग! तुम्हारे वचन अलौकिक और प्रिय हैं; तुम्हारे हृदय-दृष्टि का यह ज्ञान कैसे उत्पन्न हुआ, अब बताओ।