Jamadagni, Brahmasva, and Royal Coercion (धेनुहरण-प्रसङ्गः / ब्रह्मस्व-अपरिहार्यत्वम्)
इति श्रीब्रह्माण्डे महापुराणे वोयुप्रोक्ते मध्यभागे तृतीय उपोद्धातपादे ऽष्टाविंशतितमो ऽध्यायः // २८// वसिष्ठ उवाच जमदग्निस्ततो भूयस्तमुवाच रुषान्वितः / ब्रह्मस्वं नापहर्त्तव्यं पुरुषेण विजानता
iti śrībrahmāṇḍe mahāpurāṇe voyuprokte madhyabhāge tṛtīya upoddhātapāde 'ṣṭāviṃśatitamo 'dhyāyaḥ // 28// vasiṣṭha uvāca jamadagnistato bhūyastamuvāca ruṣānvitaḥ / brahmasvaṃ nāpaharttavyaṃ puruṣeṇa vijānatā
इस प्रकार श्रीब्रह्माण्ड महापुराण के वायुप्रोक्त मध्यभाग, तृतीय उपोद्धातपाद का अट्ठाईसवाँ अध्याय। वसिष्ठ बोले— तब जमदग्नि क्रोध से युक्त होकर फिर उससे बोले: जो जानता है, उसे ब्राह्मण-धन का अपहरण नहीं करना चाहिए।