Jāmadagnya-Rāmasya Tapaścaraṇam
The Austerities of Rama Jamadagnya
इति श्रीब्रह्माण्डे महापुराणे वायुप्रोक्ते मध्यभागे तृतीये उपोद्धातपादे वसिष्ठसगरसंवादे अर्चुनोपाख्याने जामदग्न्यतपश्चरणं नाम द्वाविंशतितमो ऽध्यायः // २२// वसिष्ठ उवाच तपस्विनं तदा राममेकाग्रमनसं भवे / रहस्येकान्तनिरतं नियतं शंसितव्रतम्
iti śrībrahmāṇḍe mahāpurāṇe vāyuprokte madhyabhāge tṛtīye upoddhātapāde vasiṣṭhasagarasaṃvāde arcunopākhyāne jāmadagnyatapaścaraṇaṃ nāma dvāviṃśatitamo 'dhyāyaḥ // 22// vasiṣṭha uvāca tapasvinaṃ tadā rāmamekāgramanasaṃ bhave / rahasyekāntanirataṃ niyataṃ śaṃsitavratam
इस प्रकार श्रीब्रह्माण्ड महापुराण के वायुप्रोक्त मध्यभाग के तृतीय उपोद्धातपाद में वसिष्ठ-सगर संवाद के अंतर्गत अर्चुनोपाख्यान में ‘जामदग्न्य तपश्चरण’ नामक बाईसवाँ अध्याय। वसिष्ठ बोले—तब तपस्वी राम एकाग्रचित्त, रहस्य-एकान्त में रत, संयमी और प्रशंसित व्रत वाले थे।