रामस्य हिमवद्गमनम्
Rama’s Journey to Himavat
आकालावधि सो ऽतिष्ठन्निवातस्थप्रदीपवत् / जपंश्च देवदेवेशं ध्यायंश्च स्वमनीषया
ākālāvadhi so 'tiṣṭhannivātasthapradīpavat / japaṃśca devadeveśaṃ dhyāyaṃśca svamanīṣayā
वह समय की सीमा तक वायु-रहित स्थान के दीपक की भाँति स्थिर रहा। अपनी बुद्धि से देवों के देवेश का जप भी करता और ध्यान भी करता रहा।