ऋषिसर्गवर्णन (Rishi-Sarga Varṇana) — Account of the Creation/Origination of Sages and Beings
कन्यायां नारदो मह्यं तव पुत्रो भवेदिति / ततो दक्षः सुतां प्रदात् प्रियां वै परमेष्ठिने / तस्मात्स नारदो जज्ञे भूयः शापभयदृषिः
kanyāyāṃ nārado mahyaṃ tava putro bhavediti / tato dakṣaḥ sutāṃ pradāt priyāṃ vai parameṣṭhine / tasmātsa nārado jajñe bhūyaḥ śāpabhayadṛṣiḥ
कन्या के विषय में उसने कहा—“नारद मेरा पुत्र हो।” तब दक्ष ने परमेष्ठी को अपनी प्रिय पुत्री दे दी। उसी से नारद फिर उत्पन्न हुए, जो शाप के भय को जानने वाले ऋषि थे।