Nakṣatra-Śrāddha (Ancestral Rites Connected with Asterisms) — नक्षत्रश्राद्धम्
कृत्स्नं यथावत्समुपैति तत्परस्तथैव भूयः प्रलयत्वमात्मनः / प्रत्याहरेद्योगपथं न यो द्विजो न सर्वपार क्रमपारगोचरः
kṛtsnaṃ yathāvatsamupaiti tatparastathaiva bhūyaḥ pralayatvamātmanaḥ / pratyāharedyogapathaṃ na yo dvijo na sarvapāra kramapāragocaraḥ
जो द्विज तत्पर होकर समस्त तत्त्व को यथावत् प्राप्त करता है, वही फिर अपने आत्मस्वरूप के प्रलय-भाव को भी प्राप्त करता है। जो योगमार्ग में प्रत्याहार नहीं करता, वह सर्वपार और क्रमपार तक नहीं पहुँचता।