Śrāddha-kalpa: Amarakantaka–Tīrtha-Māhātmya and Akṣaya Pitṛ-Tarpaṇa
गत्वा चैतानि पूतःस्याच्छ्रदद्धमक्षयमेव च / जपो होमस्तपो ध्यानं यत्किञ्चित्सुकृतं भवेत्
gatvā caitāni pūtaḥsyācchradaddhamakṣayameva ca / japo homastapo dhyānaṃ yatkiñcitsukṛtaṃ bhavet
इन तीर्थों में जाकर मनुष्य पवित्र होता है और उसकी श्रद्धा अक्षय हो जाती है। जप, होम, तप, ध्यान तथा जो भी पुण्यकर्म हो—सब फलदायी होता है।