Śrāddha-kalpa: Amarakantaka–Tīrtha-Māhātmya and Akṣaya Pitṛ-Tarpaṇa
देवालये तपस्तस्वा एकपादेन दुश्चरम् / निराहारो युगं दिव्यमुमातुङ्गो स्थितो ज्वलन्
devālaye tapastasvā ekapādena duścaram / nirāhāro yugaṃ divyamumātuṅgo sthito jvalan
देवालय में उसने एक पाँव पर कठिन तप किया; निराहार रहकर दिव्य युग तक उमातुङ्ग (उमा का प्रिय) ज्वलंत होकर स्थित रहा।