Śrāddha-kalpa: Amarakantaka–Tīrtha-Māhātmya and Akṣaya Pitṛ-Tarpaṇa
गत्वैतान्मुच्यते पापद्द्विजो वह्निं समाश्रयन् / श्राद्धं चानन्त्यमेतेषु जपहोमतपांसि च
gatvaitānmucyate pāpaddvijo vahniṃ samāśrayan / śrāddhaṃ cānantyameteṣu japahomatapāṃsi ca
इन तीर्थों में जाकर और अग्नि का आश्रय लेकर द्विज पाप से मुक्त हो जाता है। यहाँ श्राद्ध का फल अनन्त होता है, तथा जप, होम और तप भी सिद्ध होते हैं।