Śrāddha-kalpa: Amarakantaka–Tīrtha-Māhātmya and Akṣaya Pitṛ-Tarpaṇa
कृतपापो ऽपि शुध्येत किं पुनः शुभकर्मकृत् / तिर्यग्योनिं न गच्छेच्च कुदेशे च न जायते
kṛtapāpo 'pi śudhyeta kiṃ punaḥ śubhakarmakṛt / tiryagyoniṃ na gacchecca kudeśe ca na jāyate
पाप करने वाला भी शुद्ध हो सकता है, फिर शुभ कर्म करने वाला तो कितना अधिक। वह न तिर्यक् योनि में जाता है और न ही कुदेश में जन्म लेता है।