Śrāddha-kalpa: Amarakantaka–Tīrtha-Māhātmya and Akṣaya Pitṛ-Tarpaṇa
इति श्रीब्रह्माण्डे महापुराणे वायुप्रोक्ते मध्यभागे तृतीये उपोद्धातपादे श्राद्धकल्पे द्वादशो ऽध्यायः // १२// बृहस्पतिरुवाच सकृदभ्यर्चिताः प्रीता भवन्ति पितरो ऽव्ययाः / योगात्मानो महात्मानो विपाप्मानो महौजसः
iti śrībrahmāṇḍe mahāpurāṇe vāyuprokte madhyabhāge tṛtīye upoddhātapāde śrāddhakalpe dvādaśo 'dhyāyaḥ // 12// bṛhaspatiruvāca sakṛdabhyarcitāḥ prītā bhavanti pitaro 'vyayāḥ / yogātmāno mahātmāno vipāpmāno mahaujasaḥ
इस प्रकार श्रीब्रह्माण्ड महापुराण के वायुप्रोक्त मध्यभाग के तृतीय उपोद्धातपाद के श्राद्धकल्प में बारहवाँ अध्याय। बृहस्पति बोले—एक बार भी विधिपूर्वक पूजित होने पर अव्यय पितर प्रसन्न होते हैं; वे योगस्वरूप, महात्मा, पापरहित और महान तेजस्वी हैं।