श्राद्धकल्पे पितृदेवपूजाक्रमः (Śrāddhakalpa: Order of Pitṛ and Deva Worship)
आकाशे गमयेद्वापि अप्सु वा दक्षिणामुखः / पितॄणां स्थानमाकाशं दक्षिणा चैव दिग्भेवेत्
ākāśe gamayedvāpi apsu vā dakṣiṇāmukhaḥ / pitṝṇāṃ sthānamākāśaṃ dakṣiṇā caiva digbhevet
दक्षिणमुख होकर पिण्ड को या तो आकाश में प्रवाहित करे, अथवा जल में। पितरों का स्थान आकाश है और दक्षिण दिशा ही उनकी दिशा मानी गई है।