श्राद्धकल्पे पितृदेवपूजाक्रमः (Śrāddhakalpa: Order of Pitṛ and Deva Worship)
इति श्रीब्रह्माण्डे महापुराणे वायुप्रोक्ते मध्यभागे तृतीये उपोद्धातपादे श्राद्धकल्पे समिद्वर्णन नामैकादशो ऽध्यायः // ११// सूत उवाच देवाश्चपितरश्चैव अन्योन्यं नियताः स्मृताः / आथर्वणस्त्वेष विधिरित्युवाच बृहस्पतिः
iti śrībrahmāṇḍe mahāpurāṇe vāyuprokte madhyabhāge tṛtīye upoddhātapāde śrāddhakalpe samidvarṇana nāmaikādaśo 'dhyāyaḥ // 11// sūta uvāca devāścapitaraścaiva anyonyaṃ niyatāḥ smṛtāḥ / ātharvaṇastveṣa vidhirityuvāca bṛhaspatiḥ
इस प्रकार श्रीब्रह्माण्ड महापुराण के मध्यभाग के तृतीय उपोद्धातपाद, श्राद्धकल्प में ‘समिद्वर्णन’ नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ। सूत बोले—देव और पितर परस्पर एक-दूसरे से नियत माने गए हैं; बृहस्पति ने कहा—यह विधि आथर्वण परंपरा की है।