Vaivasvata-Manu Sarga and the Re-Manifestation of the Saptarṣis (वैवस्वतसर्गः—सप्तर्षिप्रादुर्भावः)
धृत्वा जुहाव हस्ताभ्यां स्रुवेण परिगृह्य च / आस्रवज्जुहुयां चक्रे मन्त्रवच्च पितामहः
dhṛtvā juhāva hastābhyāṃ sruveṇa parigṛhya ca / āsravajjuhuyāṃ cakre mantravacca pitāmahaḥ
फिर पितामह ने उसे हाथों में धारण कर, स्रुव से ग्रहण करके, मंत्रोच्चार सहित आहुति दी; और जो बह निकला था, उसे भी होम में समर्पित किया।