Vaivasvata-Manu Sarga and the Re-Manifestation of the Saptarṣis (वैवस्वतसर्गः—सप्तर्षिप्रादुर्भावः)
सूत उवाच कीर्त्तयिष्ये तृतीयं वः सोपोद्धातं सविस्तरम् / पादं समुच्चयाद्विप्रा गदतो मे निबोधत
sūta uvāca kīrttayiṣye tṛtīyaṃ vaḥ sopoddhātaṃ savistaram / pādaṃ samuccayādviprā gadato me nibodhata
सूत बोले—हे विप्रो, मैं उपोद्घात सहित तीसरे पाद का विस्तार से कीर्तन करूँगा; संक्षेप-संग्रह से कहते हुए मेरी वाणी को ध्यान से सुनो।