चक्षुर् आलोकनायैव संशयं कुरुते मनः बुद्धिर् अध्यवसानाय साक्षी क्षेत्रज्ञ उच्यते //
इस श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल ‘57’ संख्या दी है। कृपया श्लोक भेजें, तब अनुवाद किया जाएगा।