नवनीतं यथा दध्नः काष्ठाद् अग्निर् यथैव च तथैव विदुषां ज्ञानं मुक्तिहेतोः समुद्धृतम् //
यह ब्रह्मपुराण का पैंतीसवाँ श्लोक-स्थान है; मूल संस्कृत पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है।