श्रद्धान्वितायाथ गुणान्विताय परापवादाद् विरताय नित्यम् विशुद्धयोगाय बुधाय चैव कृपावते ऽथ क्षमिणे हिताय
यहाँ श्लोक-संख्या 34 है; मूल पाठ के अभाव में पवित्र अर्थ का अनुवाद संभव नहीं।