पौण्ड्रको वासुदेवश् च वासुदेवो ऽभवद् भुवि अवतीर्णस् त्वम् इत्य् उक्तो जनैर् अज्ञानमोहितैः //
यह चतुर्थ श्लोक है—जो पुराण का पाठ करता या सुनता है, वह पुण्य पाता है और उसका पाप धीरे-धीरे क्षीण होता है।