यच् चान्यद् अकरोत् कर्म दिव्यचेष्टाविघातकृत् कथ्यतां तन् मुनिश्रेष्ठ परं कौतूहलं हि नः //
यहाँ श्लोक 2 का निर्देश है; मूल पाठ उपलब्ध नहीं है।