श्रीभगवान् उवाच देवराजो भवान् इन्द्रो वयं मर्त्या जगत्पते क्षन्तव्यं भवतैवैतद् अपराधकृतं मम //
द्वितीय श्लोक का मूल संस्कृत पाठ भी उपलब्ध नहीं; अतः यथार्थ अनुवाद हेतु पाठ भेजें।