मोहाय यदुचक्रस्य विततान स वैष्णवीम् उवाच चाम्ब भोस् तात चिराद् उत्कण्ठितेन तु //
यह दूसरा वचन धर्मार्थ श्रद्धा से पढ़ने योग्य है।